Sunday, August 12, 2007

~~ जीवन की डोर ~~

ये हौसला कैसे झुके,
ये आरजू कैसे रुके ॥



मंजिल मुश्किल तो क्या,
धुंधला सहिल तो क्या,
तन्हा ये दिल तो क्या ॥


राह पे काँटें बिखरे अगर,
उसपे तो फिर चलना ही है,
श्याम छुपाले सूरज मगर,
रात को एक दिन ढलना हि है ॥


रुत ये टल जायेगी,
हिम्मत रंग लायेगी,
सुबह फिर आयेगी ॥



ये हौसला कैसे झुके,
ये आरजू कैसे रुके ॥



होगी हमे तो रहमत अदा,
धूप कटेगी साए तले,
अपनी खुदा से है ये दुआ
मंजिल लगाले हमको गले ॥


जुर्र्त सौ बार रहे,
ऊँचा इकरार रहे,
जिंदा हर प्यार रहे ॥



ये हौसला कैसे झुके,
ये आरजू कैसे रुके ॥

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